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अस्पतालों की राह बनी ‘मौत की परीक्षा’! आधा किलोमीटर सड़क पर गड्ढे ही गड्ढे, जिम्मेदारी के खेल में पिस रही जनता

प्रमोद गुप्ता की रिपोर्ट

कोरबा। शहर के बीचोंबीच एक ऐसी सड़क मौजूद है, जहां से रोजाना मरीज, गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग, स्कूली विद्यार्थी और सैकड़ों वाहन गुजरते हैं। सड़क की हालत देखकर सवाल उठता है—आखिर इस सड़क का माई-बाप कौन है?

कोसाबाड़ी चौक के समीप से मंगलम विहार की ओर जाने वाली करीब आधा किलोमीटर लंबी यह सड़क वर्षों से बदहाली की कहानी बयां कर रही है। सड़क पर डामर तो दूर, कई हिस्सों में मुरुम तक नजर नहीं आता। बारिश होते ही जगह-जगह पानी से भरे गड्ढे इसे सड़क कम और किसी दलदली रास्ते जैसा बना देते हैं।

सबसे गंभीर बात यह है कि इसी मार्ग के आसपास फिजिक्सवाला/विद्यापीठ, दोपहिया वाहन शोरूम, न्यू कोरबा हॉस्पिटल (NKH), कृष्णा मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल और मंगलम विहार कॉलोनी जैसे महत्वपूर्ण संस्थान हैं। यानी यह कोई सुनसान गली नहीं, बल्कि शहर की महत्वपूर्ण आवाजाही वाली सड़क है।

🚑 मरीजों के लिए रास्ता या ‘झटकों की परीक्षा’?

अस्पताल जाने वाले मरीजों के लिए यह सड़क किसी परेशानी से कम नहीं है। एंबुलेंस और निजी वाहनों को गड्ढों से होकर गुजरना पड़ता है। गर्भवती महिला हो, हड्डी के मरीज हों या बुजुर्ग—हर झटका तकलीफ बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।

बारिश में हालात और बिगड़ जाते हैं। सड़क के बड़े-बड़े गड्ढों में पानी भरने के बाद उनकी गहराई का अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो जाता है। दोपहिया वाहन चालक दुर्घटना के जोखिम के बीच सफर करने को मजबूर हैं।

💰 टैक्स लाखों का, सड़क बदहाल क्यों?

इस इलाके में व्यावसायिक प्रतिष्ठान और आवासीय कॉलोनी दोनों हैं। यहां रहने और कारोबार करने वाले लोग नगर निगम को टैक्स देते हैं, लेकिन बदले में उन्हें मूलभूत सुविधाओं में सबसे जरूरी सड़क के लिए वर्षों से इंतजार करना पड़ रहा है।

सड़क के किनारे व्यवस्थित नाली नहीं, पर्याप्त स्ट्रीट लाइट की समस्या और ऊपर से जर्जर रास्ता—ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जिम्मेदार एजेंसी कौन है?

⚠️ असली खेल सड़क का नहीं, ‘जिम्मेदारी’ का है!

इस मामले में सबसे चौंकाने वाली स्थिति सड़क की हालत से भी ज्यादा जिम्मेदारी को लेकर विरोधाभास है।

नगर निगम आयुक्त की ओर से सड़क को प्राइवेट बताते हुए न्यायालयीन प्रकरण का हवाला दिया गया। वहीं कोसाबाड़ी जोन के अधिकारी का कहना है कि सड़क नगर निगम की है, हालांकि पूर्व में न्यायालयीन मामला होने के कारण निर्माण अटका था।

उधर मंगलम विहार के कॉलोनाइजर का दावा है कि करीब 12 वर्ष पहले कॉलोनी से संबंधित औपचारिकताएं पूरी कर सड़क एवं अन्य सुविधाएं नगर निगम को हैंडओवर की जा चुकी हैं और इसका प्रमाण पत्र भी निगम ने दिया था। कॉलोनाइजर के अनुसार पूर्व में न्यायालय से जुड़े मामले भी निराकृत हो चुके हैं।

अब जनता का सीधा सवाल है—जब सड़क प्राइवेट है तो निगम का अधिकारी इसे अपनी सड़क क्यों बता रहा है? और अगर यह निगम की सड़क है तो वर्षों से निर्माण क्यों नहीं हुआ?

📂 32 लाख की स्वीकृति भी धूल खा गई!

मामला और गंभीर इसलिए हो जाता है क्योंकि जोन अधिकारी के मुताबिक पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल के कार्यकाल में इस सड़क के निर्माण के लिए करीब 32 लाख रुपए की स्वीकृति भी मिल चुकी थी। लेकिन न्यायालयीन विवाद के कारण काम आगे नहीं बढ़ सका।

यदि विवाद अब समाप्त हो चुका है, तो फिर सड़क आज भी उसी बदहाल स्थिति में क्यों है?

🚨 वीआईपी काफिले गुजर सकते हैं, जनता क्यों नहीं?

विडंबना देखिए—जिस रास्ते से कभी मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और हाल ही में प्रदेश के उद्योग मंत्री का काफिला चिकित्सा संस्थानों तक पहुंच चुका है, उसी सड़क पर आम आदमी आज गड्ढों और कीचड़ के बीच सफर करने को मजबूर है।

क्या सड़कें सिर्फ वीआईपी आवाजाही के समय याद आती हैं?

जनता को अब आश्वासन नहीं, स्पष्ट जवाब चाहिए।

🔥 ‘माई-बाप’ की तलाश में सड़क, जवाबदेही की तलाश में जनता

यह मामला सिर्फ एक सड़क का नहीं, बल्कि जवाबदेही के उस सिस्टम का आईना है जहां फाइलें घूमती रहती हैं और सड़कें टूटती रहती हैं।

अगर सड़क निगम की है तो निर्माण की जिम्मेदारी निगम की होनी चाहिए। अगर कोई कानूनी अड़चन है तो उसकी वर्तमान स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। अगर पुराना विवाद समाप्त हो चुका है तो निर्माण में देरी का कारण भी सामने आना चाहिए।

जनता का सवाल सीधा है—सड़क आखिर किसकी है?

निगम की, कॉलोनाइजर की या फिर किसी ऐसी फाइल की, जो वर्षों से सरकारी दफ्तरों में दबकर जनता की परेशानी बढ़ा रही है?

अब इस ‘लावारिस सड़क’ का माई-बाप तय होना चाहिए और जिम्मेदारी भी। क्योंकि गड्ढों से जनता रोज गुजर रही है, लेकिन जिम्मेदारी अब भी कागजों में घूमती नजर आ रही है।

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